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    पलमोती जीवनमाला में गुँथे

    पल को चुनते, पल को बुनते पल को सहेजते रहे
    पल था के बंदमुट्ठी से सरकता फिसलता ही गया

    मैंने देखा फिसल झरते-गिरते हुए वे मोती से पल
    जीवन माला में गुँथे थे जो सभी मौसम से झर गए

    गिरते ही वे निगाहों से ओझल जाने कहाँ होते रहे
    एक के पीछे एक कतार में बस तार हाथ रह गया

    तार है हाथ में, शायद ये भी नजर का कसूर ही है
    क्युंके हाथ का बचा तार भी, ये चला..लो..वो चला