• avirck 38w

    सुबह की अंगड़ाई भी तुम हो,
    शाम की तन्हाई भी तुम हो ,
    खिड़की से झाकूँ तो घास पे जमी ओस भी तुम हो,
    दोपहरी की लहर और खुदा की मेहेर भी तुम हो,
    नदी का किनारा और खेल सारा भी तुम हो,
    मेरे चेहरे की हँसी और आंखों में नमी भी तुम हो,
    मेरी ढलती रातों की तन्हाई और अगले सुबह की नई किरण भी तुम हो!

    ©avirck