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    पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी की यह रचना सोहर छ्न्दों में है और भगवान श्रीराम के विवाह के अवसर के नहछू का वर्णन करती है। नहछू मुख्य रूप से नाखून काटने एक रीति है, जो पूर्वी भारत में विवाह और यज्ञोपवीत के पूर्व की जाती है। यह विशेष रूप से नाई या नाइन व अन्य सम्बन्धित स्त्रियों के नेगचार से सम्बन्धित होती है। तुलसीदास की 'रामलला नहछू' रचना अवधी भाषा में है और सरल स्त्री लोकगीतोपयोगी शैली में प्रस्तुत की गयी है।

    'श्रीरामलला नहछू
    कोटिन्ह बाजन बाजहिं दसरथ के गृह हो ।
    देवलोक सब देखहिं आनँद अति हिय हो।।
    नगर सोहावन लागत बरनि न जातै हो।
    कौसल्या के हर्ष न हृदय समातै हो ।।२।।
    (महाराज दशरथ जी के महल में करोड़ों बाजे बज रहे हैं, जिसे देखकर देवताओं के हृदय में भी अत्यंत आनंद हो रहा है। अयोध्या नगरी की शोभा इतनी मनोहारी है कि उसका वर्णन असम्भव है। माता कौशल्या का आनंद तो हृदय में सिमटता ही नहीं है।)

    आले हि बाँस के माँड़व मनिगन पूरन हो।
    मोतिन्ह झालरि लागि चहूँ दिसि झूलन हो।।
    गंगाजल कर कलस तौ तुरित मँगाइय हो।
    जुवतिन्ह मंगल गाइ राम अन्हवाइय हो ।।३।।
    (श्रेष्ठ बांसों से मण्डप की रचना की गई है जिसे मणियों से परिपूर्ण किया गया है और चारो दिशाओं में मोतियों की झालरें लटकाई गई हैं। गंगाजल से पूर्ण कलश को तत्काल मंगवाया गया है और युवतियों से मांगलिक गीत गाते हुए प्रभु श्री राम को मण्डप में लेकर आने को कहा गया है।)

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    सरलार्थ
    २,३


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