• darpan 6w

    2122 2122

    हिज्र- जुदाई
    तीरगी-अंधेरा

    @hindiwriters
    By unknown writer

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    खूब रोये

    2122 2122

    खूब रोये ज़िन्दगी में
    ग़म के कांटे थे घड़ी में

    सब उजालें नाम के थे,
    कुछ नहीं था रौशनी में

    मुझसे वो साया बना है
    जो नहीं है तीरगी में

    कोई तो तस्वीर खींचो,
    बह रहा हूँ मैं नदी में

    इश्क़ बरसा जून में तो,
    फूल होंगे फरवरी में

    आंख मेरी वो शहर है
    तुम हो जिसकी हर गली में

    कौन छत पर दिख रहा है
    चाँद जैसा चांदनी में

    हिज्र में आंसू नहीं थे,
    कुछ कमी थी आशिक़ी में

    मेरे मरने की ख़बर भी ,
    टाल देना तुम हँसी में

    या तो मैं हूँ या ख़ुदा है,
    इस सफ़र के आख़री में

    कोई "दर्पण" को निकालो,
    फँस गया वो दिल्लगी में

    दर्पण©