• anamica 6w

    BLESSINGS BY SATGURU

    : *धन निरंकार जी*
    *रहमत सतगुरू की*

    *काव्य कोष अंकुश नारंग*

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    *मेरे सतगुरू- विराजमान हैं*
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    ॥ लगु कविता ॥

    *मेरे सतगुरू- विराजमान होते*
    जिस पवित्र- हर्दय के द्वार में।

    *स्वागत में खुले रहते सब द्वार*
    सन्त आगमन- के इन्तजार में।


    *भक्ति की थाली परोसी जाती*
    एकत्व में- इश्क में- प्यार में।

    *पलकों का आसन बिछातें वहाँ*
    "अंकुश" सन्तों के -सतकार में।


    *अनमोल वचनों के मिलें मोती*।
    झौलीयाँ भर कर - उपहार में।

    *बनाए जाते हैं- झरोखे हजारों*
    अंकुश- बीच खड़ी -दीवार में।


    *गुलाब सी खुशबू मिलती वहाँ*
    खिले गुलाब संग- हर खार में।

    *हर जाति भाषा- का एक रूप*।
    अंकुश नजर आता- दातार में।

    *जिस पवित्र - हर्दय के द्वार में*
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    तिथि ::- *12 JUNE 2018*
    .अंकुश नारंग-
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