• qasidsultanpuri 3w

    बसंत

    सर झुखाये मैं धीरे-धीरे राह चल रहा था,
    जज़बातों को आँखों से अश्क़ों में बदल रहा था।

    तभी नज़र पड़ी मेरी एक छोटे से फूल पर,
    अकेला उस ठंडी बयार में इठलाता हुआ सा।

    कोई अलग ही धुन को गाता हुआ शायद,
    मुझे धीरे से ये बताते हुए शायद,

    बसंत आ रहा है......
    बसंत आ रहा है......