• jyotsnaabha 15w

    देख रही हूँ, शरारती हो रहे हो-
    कभी पैरों पर सरसराते;
    कभी बंद मुट्ठी भिगो रहे हो
    बैठी तो हूँ तेरे पास~ छत से लगकर
    -जैसे माँ देखती हो बच्चे को
    आँगन में खिलखिलाते
    क्यूँ अपने खेल में मुझे खींच
    भिगोने को बेताब हो रहे हो!

    नाज़ुक-सी हैं यादें~
    तेरी शरारत से इन्हें ज़ुकाम होगी!
    मुट्ठी खुली तो बेबात ही
    यादें ये बेहिजाब होंगी
    क्यूँ, ये खुदगर्ज़ी! क्या बात बुरी लगी?
    जो बादलों से ऊँगली छुड़ा अब
    ज़मीं पे गिर-गिर रो रहे हो?
    ©jyotsnaabha