• nehulatagarg 5w

    खुद को ना ही सम्हाल पा रही थी और ना ही हिम्मत जुटा पा रही थी और ना ही इस परिस्थिति को स्वीकार कर पा रही थी और वो स्टूल पर बैठी हुयी निढाल सी चित्रांगद से लगकर रोने लगती है और इल्तजा़ करती है की , उन्हें यह सब करने की कोई आवश्यकता नहीं है और वो यह सब नहीं देख सकती और ना ही सह सकती इस सितम को जो उन पर किया जा रहा है और वो हैरान - परेशान सी बस एक ही रट लगाये हुए थे की ,वो यह सब ना करें और यहाँ से चलें जायें । अंगना को खुद से ज्यादा चित्रांगद की फिक्र थी और जो दर्दों - गम और पीडा को वो अपने अन्दर जज्ब़ किये हुए थे वो तो अंगना की आँखों से आँसूओं के रूप में निकल रहें थे और वो बहुत बेचैन थी तो बहुत मजबूर भी और चित्रांगद उन्हें अपने चेहरे की मुस्कुराहट और धीरज से उन्हें ढांढस बंधाने में लगे हुए थे लेकिन अंगना तो सम्हालें नहीं सम्हल पा रही थी और कैसी विडंबना थी यह जिस चित्रांगद के पसंदीदा स्वर्णीम लाल लिबास में थी वो जिसे स्वयं चित्रांगद के अनुसार ही बनाया गया था आज वो उसे किसी और के लिये पहनें हुए थी और जो श्रृंगार चित्रांगद के लिये था वो भी किसी और के लिये था और विवाह मंडप में जिसके साथ बैठने वाली थी वो , वो तो उनसे दूर जा रहें थे और जो अंगना कभी झुकी नहीं और जिसे अपनी पत्नी बनाने के ख्वाब दिखने वालों के ख्वाबों को जो आज तक धूमिल करती आयी थी और जिसे दुनिया की कोई भी ताकत मजबूर नहीं कर पायी थी आज एक ऐसे अनजान शख्स के हाथों वो मजबूर थी जिसे वो जानती भी नहीं थी और ना ही जिसे उसने पहले कभी देखा था । उसे खुद पर गुस्सा आ रहा था और नफरत भी हो रही थी की , वो कुछ भी तो नहीं कर पा रही थी और ऐसे हालात उसकी जिंदगी में पहली बार बनें थे और वो ही उसे तोड़ने में लगे हुए थे और अहसास हो रहा था की , मजबूरी सबसे ज्यादा बुरी होती है और खुदा मौत भले ही दे दें लेकिन मजबूर ना होने दें कभी भी किसी भी इंसान को । चित्रांगद उन्हें समझाते हुए कहने लगते है - आप जानती है हमारी सबसे बडी कामना यही थी

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    चित्रांगना

    कि , हम अपने ही हाथों से आपको दुल्हन के रूप में श्रृंगारित करें और हमारी वो मनोकामना पूर्ण हो ही गयी और यह क्षण हमारे जीवन में बहुत ही विशेष और अविस्मरणीय क्षण है जिनकी सुगंध हमारी सांसों में सदैव ही समायी रहेगी और आपका यह रूप .. अंगना झट से उठकर चित्रांगद को अपनी बाहों में भर लेती है और तडपती - तरसती - कसकती और टूटी हुयी सी उनके आगोश में समायी जा रही थी और भावनाओं का कोई पारावार बचा ही नहीं था अब बस लग रहा था की , इसी पल में अंगना उनकी बाहों में ही अपनी सांसों की डोर को तोड दें ताकि कोई भी उन्हें उनसे अलग ना कर पाये लेकिन वो चाहकर भी तो ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि बात यहाँ उन दोनों की थी ही नहीं उनके परिवार उनकी प्रजा और उन मासूम बच्चों की थी और चित्रांगद भी भावुक हो चलें थे और जिस तूफ़ान को वो अपने अन्दर दबाये हुए थे वो तूफ़ान फट पडने वाला था और दोनों एक - दूसरे में खोये बेचैन और हताश थे और उससे भी ज्यादा मजबूर और यही मजबूरी उन्हें पल - पल मारती जा रही थी और वो बस जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद में लगें हुए थे । सौम्यदीप के सामने अंगना ने भी शर्त रख दी थी की , वो तब तक विवाह मंडप में नहीं बैठेगी जब तक पराक्रमवर्धन परिवार के साथ उन बच्चों को भी मुक्त कर दिया जायेगा और साथ ही अगस्तय को भी क्योंकि वो उस पर विश्वास नहीं कर सकती क्योंकि वो विवाह पश्चात उन्हें मार सकते है और उन बच्चों को भी ना छोडें क्योंकि हमेशा आप जैसे लोग यही नीति अपनाते है जो मुझे स्वीकार्य नहीं है । कठिका तो मना करती है लेकिन सौम्यदीप मान जाते है लेकिन अगस्तय को नहीं छोडते और कहते है की , वो उनकी बुद्धिमता का लोहा मानते है और उन्हें यह मानने और स्वीकार करने में भी कोई गुरेज नहीं है की , चित्रांगद के लिये तो अंगना जैसी ही स्त्री बन सकती थी और कोई नहीं तभी तो ईश्वर ने उन्हें चित्रांगद के लिये बनाया और कदाचित इसीलिये संसार के बडे - बडे राजाओं ने उसके व्यक्तित्व के इस लोहे को माना है और तभी तो वो राजाओं की निर्माणकर्ता भी सिद्ध हुयी है लेकिन यहाँ आपकी यह