• arunbhardwaj 6w

    निर्वाण को निर्माण है, शब्द शांत क्षुब्ध हैं
    विषय है विराग में , अतिरेक क्षीण लब्ध है
    स्वर्णपत्रा दे बता है अनुराग पाठ्यक्रम कहाँ
    स्वयं मे क्यूं खो गया बल आंजनेय क्रुद्ध है

    तनिक विभिषीका के पटतरों में देख कौन है
    प्रशस्ति की आसक्ति में मन कवि क्यूँ मौन है
    उदघाट दे नेपथ्य दृग दिखा ज़रा तू वस्तु दिग
    मन आर्त है ! पुकार है ! रचना हुई निषिध्द है

    दिगंतरो प्रसार तक ये कल्पना जगत टिके
    आधार के हस्ति पद स्तम्भ योज्य थे भले
    प्रहार जाने शेष फुंफकार से प्रबल हुआ
    विषशमन की औषधि को तू आहूत करबद्ध है

    बुद्धि अनुमान एकमेव तू प्रवीण है
    कटाक्षरी निष्पत्ति के भुव भाव शून्य हैं
    कृष्णा ! प्रवंचना के मोह पाश में फँसा हुआ
    प्रसूच्य तर्जनी के रक्तस्राव ऋण प्रसिद्ध है


    Arun Bhardwaj (Atirek)