• manigupta359 18w

    उसे मैं तब तक देखता रहा, जब तक वह मेरी नज़रों से ओझल नहीं हो गया। तब एहसास हुआ कि काश मैं इंसान होता, उसे जता पाता कि मैं उसे बहुत याद करूँगा, काश उसे गले लगा पाता।
    और आज तक उसकी छवि, उसकी मुस्कुराहट, उसका मुझे दोस्त कहना, सब मेरे दिल में ज़िंदा है।

    *****

    "कैसे हो दोस्त?" एक गहरी-सी आवाज़ सुनाई दी। एक पल को लगा कि यह मेरा भ्रम है, मेरे छोटू की याद की गूँज है। लेकिन दूसरे ही पल, किसे के स्पर्श के साथ, दोबारा आवाज़ जुड़ी, "मैंने कहा था ना, मैं तुमसे मिलने आऊँगा!" मैंने नज़रे झुकाकर देखा, वह आदमी जो बड़ी गाड़ी में आया था, बच्चे का हाथ थामे खड़ा था। 'इतना बड़ा हो गया मेरा छोटू, इतना बड़ा आदमी बन गया', मैं फूले नहीं समा रहा था। मेरी खुशी आसमान पार कर चुकी थी। बेशक, अब वह छोटू नहीं है, पर मेरे लिए, हमेशा रहेगा।

    "पापा, आप इस लाइट से बात क्यों कर रहे हो? ये बात नहीं करती!"

    "बेटा, यह मेरा बचपन का दोस्त है। यह मेरी हर बात जानता है। मैं आज जो कुछ हूँ, सिर्फ मेरे दोस्त के कारण हूँ, बेटा!" छोटू बोला।

    आसपास के लोग, उसे मुझसे बात करते देख हैरान हुए, पर छोटू को कोई फ़रक नहीं पड़ा।

    "पापा, बारिश शुरु हो गई, कार में चलो!!"

    "आज मुझे अपने दोस्त से बातें करनी हैं, बेटा।" उसने जवाब दिया और मेरे पास बैठ गया।

    मानो, आकाश ने आज खुशी के आँसू बरसाना आरंभ किया था। उस सावन की सांझ ने, 20 बरस बाद, मुझे मेरे दोस्त, मेरे छोटू से जो मिलाया था।

    The end.

    _Mani Gupta_


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    Kindly, read the first and second part under #stories_by_mani if you're reading this story for the first time!

    @whiskeyblues @_shweta @hardeepheals @dsd07sr @harsha154

    Thank you so much guys for all the support❤. I can't even describe how humbled I am����

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    वह सावन की सांझ... (3/3)

    एक दिन वह अपना सामान बाँधकर, सामने चायवाले के पास रखके कहीं चला गया। 'पता नहीं, कहाँ जा रहा है? मैंने सोचा। एक-डेढ़ घंटे बाद आया, हाथ में पोलिथिन थामे। उसने वह खोला और सरकारी स्कूल की एक पुरानी-सी वर्दी निकाली। उसके चेहरे से उसकी खुशी का अंदाज़ा लगाया जा सकता था। तब मैं समझा कि उस दिन वह अख़बार पढ़ते आदमी को क्यों देख रहा था। उसके पढ़ने-लिखने के जुनून ने, मेरा दिल गर्व से भर दिया था।

    "दोस्त, मेरा दाखिला हो गया स्कूल में। अब मैं पढ़ सकूँगा, लिख सकूँगा और लोगों की तरह!" वह बोला, मेरे लोहे के शरीर पर अपना हाथ रखते हुए। अब वह मुझसे बात करने लगा था, यह जानते हुए कि मैं निर्जीव, कुछ नहीं बोल सकता था।

    "बस कुछ देर और चल जाओ, दोस्त, ये जूते ठीक कर दूँ।" वह बोला, मेरी हिलती हुई रोशनी देखकर, क्योंकि मेरे सिर के नीचे लगी लाइट को बदलने की ज़रूरत आन पड़ी थी।

    छोटू अब रोज़ाना स्कूल जाने लगा था। दोपहर में वापस आकर, फिर से काम में जुट जाता था। "पढ़ाई कैसी चल रही है, छोटू?" चायवाले ने पूछा। "अच्छी चल रही, साब" वह मुस्कुराकर बोला।

    "दोस्त, मैं अब पढ़ने बैठ रहा हूँ। मेरी परीक्षा पास आ रही है। बस ऐसे ही रोशनी करते रहना।" पढ़ते-पढ़ते कभी वह थोड़ा परेशान होता, कभी उबासी लेते हुए मेरे शरीर से कमर टिकाकर बैठ जाता, लेकिन उसका पढ़ने का जज़्बा, कभी ढलता न लगा।

    मैंने अपनी रोशनी में, लोगों को अलविदा बोलते देखा, गले मिलते देखा, कुत्तों की जान बचते देखी, पर कोई पढ़ने का शौक रखने वाला और 'दोस्त' बुलाने वाला, पहली और आखिरी बार देखा था।

    महीने बीते और फिर साल, छोटू बड़ा हो चुका था। पढ़ाई में अव्वल और हर किसी का आदर-सतकार करता था। लेकिन उसने अपना काम बिल्कुल नहीं छोड़ा। उसी मेहनत और लगन से बूट-पाॅलिश और जूते मरम्मत करता था। फिर अचानक एक दिन, वह अपना सामान बाँधने लगा और मुझसे कहा, "दोस्त, मैं जा रहा हूँ। कुछ बनकर, तुमसे मिलने ज़रूर आऊँगा। अलविदा!" यह सुनकर, एक ठेस लगी, जैसे मेरी ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा, कहीं खो रहा हो।

    (Continued in the caption��)