• sonalikaushik 24w

    एक देह बस..

    हूँ मैं एक देह बस जीती जागती एक प्रतिमा,
    बसते हैं प्राण मुझमें भी मानिंद तुम्हारे,
    भरती हूँ साँस में भी सीने में अपने हर पल बस वही उभार
    क्या हैं मुझे अलग बनाते.?
    हूँ मैं एक देह बस उसी मिट्टी से बनी जिससे हो तुम बने,
    पिघलती हूँ मैं भी ताप से मानिंद तुम्हारे,
    करती बयान वही ताप जब आँसू झरते मेरी आँखों से
    क्या हैं मुझे अलग बनाते.?
    हूँ मैं एक देह बस रक्त-माँस से सजी जिसमें हो तुम भी कसे,
    लाल है रंग खून का मेरा भी मानिंद तुम्हारे,
    लाल रंग वही मेरे अधरों पर लगे जब तो क्यूँ है ये मुझे अलग बनाते..?
    नहीं ये नहीं हैं मुझे अलग बनाते, बनाते हैं मुझे विचार मेरे अलग और नजरों में बसे नजरिये तुम्हारे...

    ©sonalikaushik