• adityakunwar 7w

    ईशक-ए-क़ैद

    तुम जुदा हो गयी हो मुझसे पर भी,
    मैंने उन लम्हों को वक़्त में क़ैद कर दिया है;

    तुम्हे अब देख तो नहीं सकते रोज़,
    पर मैंने तेरी परछाई को इन शब्दों में क़ैद कर दिया है;

    तुम्हे खोने के दुख का ऐहसास न होने दिया दुनिया को,
    उस दर्द को मैंने तुम्हारी नटखटी-शरारतो कि यादों से आयी मुसकान के पीछे क़ैद कर दिया है;

    रातों की तनहाईयाँ तो आती रहती है तुम्हारी याद आने पर,
    पर तुम्हे भी जब मैं याद नहीं तो मैंने भी उस मोहब्बत को उन खतों में ही क़ैद कर दिया है;

    अब ईश्क तो भला एक ही बार होता मोहब्बत तो गैरों से भी हो जाता है,
    तुम्हारा मुख्तसर रहेगा ये आशिक तुम्हारा, तुम्हारे आने तक मैंने ग़ैरों से हिफाज़त के लिए कैद कर दिया है ।

    आदित्य कुंवर
    ©adityakunwar