• kusumsharma 5w

    वैसी ही धार

    काशी-बनारस गई, गई मथुरा वृन्दावन
    संगम द्वारिका जाकर देखा, देखा सब ढिंग जाये।

    पर तू तो बडा़ ही छलिया निकला, छुपा मेरे ही आँगन आये
    दशा मेरी देखे, बोले न एकहु बैन पर:-
    कौन बचा तेरे उजियारे से,मैं भी हो गई लाल।
    अब तो::-
    दशों रसों को पीकर, कर लिया एकम एक
    जो जैसा मिले,निकले वैसी ही धार पर
    मैं वही रहूँ जैसी तूने भेजी ओ मेरे ❤कान्हा❤सरकार

    हम ईश्वर को हर जगह खोजते हैं, और खोजी खोजेगा ही,
    पर उसका तो हर घट मैं वास है और वही हम नही देखते।
    जो जैसा है उसी में रम जाती हूँ, पर अपनी पहचान खोये बिना।कौशिश रहती है, बाहरी परिस्थितियाँ विचलित न कर पायें।
    कुसुम
    ©kusumsharma