• drajaysharma_yayaver 4w

    नाउनि अति गुनखानि तौ बेगि बोलाई हो।
    करि सिँगार अति लोन तो बिहसति आई हो।।
    कनक-चुनिन सों लसित नहरनी लिये कर हो।
    आनँद हिय न समाइ देखि रामहि बर हो ।।१०।।
    (परम् गुणी नाइन को तत्काल बुलाया गया, अत्यंत मोहक श्रृंगार किए हुए हँसती हुई आई। सुनहरी चुनरी ओढ़े, हाथ में नहन्नी लिए नाइन प्रभु को देखकर इतनी आनन्दित है कि वह फूली नहीं समा रही।)

    काने कनक तरीवन, बेसरि सोहइ हो।
    गजमुकुता कर हार कंठमनि मोहइ हो।।
    कर कंचन, कटि किंकिन, नूपुर बाजइ हो।
    रानी कै दीन्हीं सारी तौ अधिक बिराजइ हो ।।११।।
    (नाइन के कान में स्वर्ण कर्णफूल, नाक में बेसरि सुशोभित हैं, गजमोतियों के हार से सजा उसका मणि तुल्य कण्ठ मोहक है। हाथों में स्वर्ण कंगन, कमर में करधनी और पाँवों में घुंघुरू बज रहे हैं तथा महारानी द्वारा प्रदान की गई साड़ी उस पर बहुत सुंदर लग रही है।)

    Read More

    सरलार्थ
    १०,११

    ©drajaysharma_yayaver