• kishore_nagpal 5w

    सत्संग नियम 1

    महाराज श्री ने समझाया है कि पूज्य स्वामी जी श्री सत्यानंद जी महाराज द्वारा स्थापित ये
    श्री रामशरणम् सत्संग कोई साधारण सत्संग स्थल नही है। ये तो वह पावन स्थान है जहाँ आकर साधक अपने आप को जीवन के सुखो दुखो से पार महसूस करते हुये, गुरुकृपा से साधक के जीवन का रुपान्तरण हो जाता है।

    पर ये सब तभी संभव हो पाता है साधक पूरे प्रेम और भाव के साथ नाम, सिमरण, ध्यान ये लीन रहता है, और साधक अपने नित्य के जीवन मे गुरुआज्ञाओ अनुसार जीवन व्यतीत करता है।

    ठीक इसी तरह से सत्संग स्थल पर भी गुरुजनो की कृपा तब ही बरसती है, जब सभी गुरुआज्ञाओ का पालन करते हुये उसी अनुसार सत्संग स्थल पर व्यवहार करते है।

    सत्संग हाल के अंदर बिल्कुल भी बात ना करना,
    पूरे समय आँखे बंद करके सत्संग मे लीन रहना,
    इधर उधर और दूसरो की तरफ बिल्कुल भी ना देखना,
    सभी साधक साधिकाओ से सम व्यवहार करना,
    स्वयं को विशेष समझने का प्रयास ना करना,
    ये सब वे मूलभूत अनुशासन की बाते है जो स्वामी जी महाराज जी ने हर सत्संग स्थल के लिये सभी साधको को निर्देशित की है, विशेष तौर पर सत्संग स्थल के व्यवस्थापको के लिये ।

    श्री अमृतवाणी जी का पाठ,
    श्री भक्ति प्रकाश जी, या श्री प्रवचन पीयूष जी, या श्री रामायण जी का पाठ,
    महाराज श्री के प्रवचन,
    और इसके बाद जो समय बचे उसमे भजन और धुन । इस तरह का सत्संग का कार्यक्रम श्री रामशरणम् दिल्ली की तरफ से सभी के लिये अनुरोधित किया जाता है । महाराज श्री के प्रवचनो के बिना तो सत्संग की कल्पना ही नही ।