• pragatisheel_sadhak_bihari 18w

    मेरे जज़्बात

    जरा मेरे रक्त से गुजरकर तुम देखना
    तुम्हें उसमें अब भी वो वक्त मिलेगा
    जिसमें कोई विभक्त होकर चीख रहा था
    शिथिल पड़े धड़कनों में होकर स्थिर मन जरा सुनना
    तुम्हें अब भी वो बच्चा नज़र आएगा
    जो हालात के आगे नतमस्तक होकर झुक रहा था
    छूना मेरे तुम पांवों को जो कोमल कोई बच्चा सा था
    पर वो रूठ कर तुम सबों से नंगे पांव भाग रहा था
    हाँ! सपने की तलाश में नहीं, तुमसे दूर गुमनाम हो रहा था
    समझा नहीं जिसके जज्बातों को, वो तुम सबों पे थूक रहा था
    वो ओछी मर्यादाएं वो घिनौनी हरकतें देखा खूब जमाने में
    लात मारी तुम सबों ने मिलकर, तब भी वो वक्त पे तेरा ही आँसू पोंछ रहा था
    सुबह की तलाश थी, वहशी अंग प्यास थी
    लपेटने को जिस्म भर बदन नहीं
    बल्कि उसे एक ज़िन्दगी की शिद्दत से तलाश थी
    मान लिया था जिसे तुमने एक बुझा चिराग
    ईंधन बाती से छीनकर
    वो अब भी तुम सबों के लिए जिंदा है
    क्योंकि उसे ही देना होगा तुम नादां मूर्खो को आध्यात्मिक ज्ञान
    पाया क्या है तुम बताओ,खोया क्या है तुम जानो
    वो बच्चा खोकर भी बहुत कुछ तब
    अब में खुद से मिला जा रहा था
    भूल जो जाता तेरे चोटों को
    शायद ही कुछ नज़र आता
    जो आत्मबल उसमें आज नज़र आ रहा था
    करने पे जब आ गया, वो दूर भ्रम जिये जा रहा था

    ©gatisheel_sadhak_bihari