• sumit_astor 14w

    अच्छी ग़ज़ल को लिखने के लिये वक्त का तक़ाज़ा रहता है।
    गालिबन ये ग़ज़ल पाँच रोज बअ'द लिखी है।
    तवक़्क़ो है आप सब अज़ीज़ अफ़सुर्दा नहीं करेंगे।
    ग़ज़ल 'महबूब' के लिए लिखी जाती है।
    इस ग़ज़ल में आप सिर्फ-ओ-सिर्फ महबूब का ही जिक्र पायेंगे।
    लुत्फ उठाते हुए इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल पर मुलाहिज़ा फरमायें।
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    जमाल (ख़ूबसूरती)
    कशिश (आकर्षण)

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    "ग़ज़ल"

    सोचता हूँ ख़ुदको बेज़ार कर के देखूं
    मोहब्बत फिर एक बार कर के देखूं

    बहुत तारीफ़ सुनी है तेरे जमाल की
    क्यूँ न तेरा हुस्न-ए-दीदार कर के देखूं

    दिल-ए-उम्मीद-वार कर के देखूं
    तुझसे इश्क़-ए-इजहार कर के देखूं

    उनका कहना है वो लौट आयेंगे
    क्यूँ न, थोड़ा इंतज़ार कर के देखूं

    उसकी बातों में है कशिश हद से ज्यादा
    क्यों न उससे बातें बेशुमार कर के देखूं

    आईने सी हैं उसकी आँखें "सुमित"
    क्यों न उसकी आँखें निहार कर के देखूं
    ©sumit_