• kmeenutosh 16w

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    कहानी लेखन का ये छोटा सा एवं प्रथम प्रयास ... सुझाव अपेक्षित ....

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    देवात्मजा

    खबर ना थी मुझे मेरे मोहल्ले मे क्या घटित हुआ है । अक्सर ही मै चिर निन्द्रा मे डूबी गलियों से गुजरते हुए अपने घर की दहलीज़ लाँघती हूँ । व्यस्तता ही कुछ ऐसी है की ऐसा ना करूँ तो भला कौन यहाँ मेरा घर भरने आने वाला है । जो है जैसा है सब मुझे ही करना है । कल क्या क्या करना है कैसे करना है बस इसी सोच मे डूबी नित्य की भांति आज भी चली आ रही थी । प्रत्येक शनिवार घर तक का सफ़र ऐसी ही उधेड़-बुन मे कटता है , इतवार की तैयारी शनिवार की रात्री से । खैर !

    घर के पीछे दो गलियाँ छोड़ देवात्मजा का घर है । अकेली नही रहती वो, भरा पूरा परिवार है । माँ -बाबा , चार बड़े भाई कीर्तिमान , मनुज , वंश , और चिरंजीव। बचपन मे मेरे घर के खूब चक्कर लगाया करती थी आज भी बड़ा स्नेह है उसे मुझसे और मेरे परिवार से । आ जाये तो लौट जाने को जी नही चाहता उसका । आज उसके रोने की आवाज़े क्यूँ सुनाई दे रहीं हैं । क्या हुआ होगा ? ऐसे तो कभी रोयी नही आजतक फिर आज क्यूँ ? मन व्यथित हो उठा यूँ उसका रुदन सुन और कुछ भी सोचे बिना ही मेरे कदम उसके घर की ओर स्वतः बढ़ चले ।

    सामने घर के मुख्य द्वार पर भीड़ एकत्रित थी और भीतर देवात्मजा रो रही थी । चारों भाई बैठे लोगों से कुछ बतिया रहे थे और नीचे फर्श पर निश्चेतन पड़े थे देवा , प्यार से हम देवात्मजा को देवा कहकर पुकारते हैं , के माँ और बाबा । ना जाने ये कैसे हुआ , क्या हुआ होगा दोनों को ? बस एक यही विचार बिजली की भांति मेरे मस्तिष्क मे कौंध गया । और जैसे बिजली गिरकर अगले ही क्षण शांत हो जाती है मेरा मन भी शांत हो गया । नही इतनी कठोर तो कभी ना थी मै फिर आज क्या हुआ ऐसे अवसर पर हृदय इतना शांत , जैसे कोई पुराना रोग निवृत हो गया हो ।

    धीरे से भीड़ को चीरती मैं देवा के पास जा बैठी । उसका बस मुझे देखना ही था और वो मुझसे लिपटकर और जोर से रोने लगी । रोते रोते बस एक ही बात कहती जाती थी , " जीजी देखो ना ये मुझे अनाथ कर गये अब क्या होगा मेरा , कैसे जिऊंगी मै , कौन मुझे पालेगा ? " उसकी बातें मुझे जैसे हैरान करती जाती थी । मैं बड़े ही असमंजस मे उसके बीते जीवन की अंधेरी गलियों मे फिसलती चली गयी ।

    अठारह वर्ष पूर्व जब हम इस मोहल्ले मे आये थे तब देवा कोई तीन वर्ष की नन्ही सी गुडिया थी । उसके चारों भाई पास के ही सरकारी विद्यालय मे पढ़ने जाया करते थे और वो यूँ ही गलियों मे दिनभर घुमती रहती थी । घुमते घुमते वो हमारे घर आ जाया करती । घंटों हमारे घर मे खेलती और कई बार तो यहीं सो जाती । फिर एक दिन अचानक ही वो नन्ही सी देवा बड़ी हो गयी , तन और उम्र से नही बल्कि सोच और दिमाग से । आम दिनों से अलग था वो दिन भूल नही सकता हमारा परिवार , मासूम सी देवा के कांधे पर हमने पहली बार झोला देखा था । हमे कोई खुशी नही हुई थी , खुशी होती भी कैसे कोई विद्यालय का झोला तो था नही कचरे का झोला था जो उसके माँ बाबा ने उसे थमाया था । दिनभर सारे मोहल्ले का फेंका हुआ प्लास्टिक का कचरा टूटी बोतलें अब वो इक्कट्ठा कर अपने झोले मे भरती और फिर रात मे मोहल्ले के बाहर कबाड़ी की दुकान पर दे आती । उसके बाबा पहले से ही वहाँ पहुँच जाते और कचरे का हिसाब कर पैसे ले आते । रास्ते से ही खाने का सौदा लेते हुए घर आते तब उसकी माँ सबके लिये खाना पकाती । जिसमें से देवा के लिये शायद ही कुछ होता । वो तो अक्सर हमारे घर ही खाना खा जाती ये कहते हुए की कचरे के पैसों से उसके लिया खाना नही आ पाता यदि वो खायेगी तो भैया क्या खायेंगे । उसकी ऐसी हालत देख मेरी माँ ने एक दिन उसके बाबा को जोर की फटकार लगाई थी जिसके बाद पड़ोस मे रहने वाली अम्मा जी ने बताया कि जिस दिन देवा का जन्म हुआ था उसके बाबा उसी दिन उसे पास के बगीचे मे गड्डा खोद दफन करने ले गये थे । बेटी थी कुल का कलंक । लोगों के देखने और डांटने के कारण ही देवा के प्राण बच पाये थे नही तो आज देवा मर चुकी होती । अब देवा दस वर्ष की आयु से ही पास की ही एक फैक्टरी मे साफ सफाई की नौकरी करती है और अपने माँ बाबा समेत चारों पढ़ाई छोड़ चुके नकारे भाईयों का पेट पालती है ।

    अपने अनाथ होने की बातें मेरे कांधे पर सर रखकर देवा बार बार दोहरा रही थी जिसने कभी माँ बाप और भाईयों का प्यार नही देखा था , आज उनके ना होने पर इतना क्यूँ तड़प रही थी । किसी से जब कुछ कहते ना बन सका तो मैने उसे समझातें हुए कहा " क्यूँ उनके लिये रोती हो जिन्हे तुम्हारी कभी कदर ना थी । जो तुम्हारा बेटी होना श्राप समझते थे । जिन्हे तुम्हारे प्रति अपना कोई कर्तव्य कभी याद ना रहा । जिन्होंने तुम्हे बाल्यावस्था मे भी कभी गोद मे ना उठाया । ऐसे लोगों के लिये अपने आँसू मत बहाओ । " ना जाने मैने ऐसा क्या गलत कह दिया के देवा ने मुझे घर से चले जाने को कह दिया और मुझसे नाराज हो गयी । उसके भाई माँ बाबा की अंतिम यात्रा के बाद उनके एकमात्र आश्रय उनके घर को बेचने की योजना बना देवा को बेसहारा छोड़ जाने की बातें कर रहे थे । मैने सब सुना और वहाँ से चुपछाप बिना कुछ और कहे ही चले आना ठीक समझा ।

    घर की ओर बढ़ते मेरे कदमों के साथ साथ मेरे दिमाग मे भी एक सवाल तेजी से बढ़ रहा था । रह रहकर मेरे दिल को कचोट रहा था । बार बार बस मैं एक जवाब तलाश रही थी --

    " जो कभी सनाथ नही थी वो भला आज अनाथ कैसे हुई ? "

    ©के मीनू तोष (४ जनवरी २०१८)