• monikakapur 6w

    कल एक ख़्वाब की चादर ओढ़े ,
    सो गए थे हम ,
    कुछ मख़मली ख़्वाब था ,
    हज़ारों गुँचे महकते थे उस पर ,
    आँखों के पोरों पर ,
    हँसी की एक लकीर खिंची थी ,
    पूरे ख़्वाब के दरमियाँ ,
    हाथों की लकीरें भी कुछ मिलती
    थी उन हँसी की लकीरों से ,
    बड़ी ख़ूब रात बीती ,
    ख़ैर
    ख़्वाब था ,
    सुबह सिलवटों से भरा था ,
    आँख पे हँसी की लकीरों की जगह
    टंगा था एक आँसू
    न रहता था
    न गिरता था
    बस हथेली की लकीरों सा
    वो भी था , न बदलने वाला

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