• aashish_nema 14w

    भाग- 2 से आगे जहाॅ उस बुजुर्ग अपनी बात सुनाई थी ....

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    { पश्चाताप भाग -३}

    वह बुजुर्ग आपबीती सुनाने के बाद कहता है--
    बेटा ! तुम जैसे बहुत आते है कोई कंबल लाता है ,कोई खाना लाता है ,हम गरीबो को कंबल और खाना ही बस नही चाहिए रहता ,इन सब के लिए तो हम खुद ही कमा लेते है पर बात जब सर पर छत की आती है तो हमे सालों लग जाते है कमाने मे;
    और फिर मेहनत करके  जिन अपनो के लिए पाई-पाई जोड़ते है , तो तब तक किसी दिन कोई कार आकर उनपर से गुजर चुकी होती है।

    उस आदमी ने अपनी बात खत्म की ही थी कि मेरे मन मे तूफान सा उठ गया ।

    मैंने अपना कोट उतार कर उस पर डाल दिया और बिना कुछ कहे वहाॅ से उठकर चला आया और रोता हुआ अपने घर को लौटने लगा,रास्ते भर मेरी ऑखो के सामने वो दृश्य घूमता रहा जब दो साल पहले पार्टी से लोटते समय मैंने फुटपाथ पर सो रही एक मासूम बच्ची पर कार चला दी थी ।
    घर पहुँचते-पहुँचते रात के 12:30 बज गए थे । माॅ ने दरवाजा खोलते ही कहा
         - बेटा! बहुत देर हो गई तुझे कंबल बांटने मे और ये अपना कोट कहां भूल आया ?
    , इतनी ठंड है बाहर ; तुझे नही लग रही क्या?

    मै चुपचाप माँ की बातो को सुनता रहा कुछ नही कहा; मुझमे इतना साहस नही था जो माँ से कह पाता कि हाॅ मुझे अब ठंड नही लग रही क्योंकि मैं अंदर से जल रहा हूॅ-  "पश्चाताप" की आग में ।

             ✒
    आशीष हरीराम नेमा
    ©aashish_nema