• bepanaah_raaj 11w

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    दो भागों में बँटी यह काव्य-प्रस्तुति---१-प्रश्न(मुमुक्षु जन प्रश्न कर रहे हैं)
    २-उत्तर(कल्पना की है कि रघुवर-भक्त तुलसीदास उत्तर दे रहे हैं)

    मुमुक्षु.... अर्थात् मोक्ष पाने की जिसमें लालसा जाग उठी हो।


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    ����हे रघुवर!!����

    हे रघुवर! ये भ्रम कैसे जाये?
    देखत, सुनत, कहत, समुझत
    तबहुँ मनवा नेह छुड़ा न पाये
    मिथ्यासागर जगत-जल शोभित
    विषयासक्ति-पंक में आलोडित
    करवाये, असत् को सत् दिखाये
    हे रघुवर! ये भ्रम कैसे जाये?
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    वेद,स्मृति, संत गुरु ज्ञानी जन
    युग-युगांतर अनेकानेक साधन
    कहते आये, कहते जायें
    जगत् भ्रम, भ्रम ही बंधन
    जो सत्य मान इसे घिरे सह अज्ञान
    हठ से स्वयं ही बँध कष्ट पाये
    हे रघुवर! ये भ्रम कैसे जाये?
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    दिखायेे सुखकारी, मनोहारी,जगत्
    मनवा, 'मैं', 'मेरा' नहीं कौनों विधि छुड़वाये
    मूठ बन जावै एक दिवस, ज्ञात होवै किन्तु
    जग-बिधि-प्रपंच में मुहुर्मुहु मन बूड़त जाये
    मोहमाया-मुकुट धारित जगत् ,तो कौन अर्थ
    जीवन का, जब मन अमात्य इस देह-भवन का दियो बनाये
    हे रघुवर! ये भ्रम कैसे जाये?
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    कह रघुवर-भक्त तुलसीदास
    जब तक रहेगा 'मैं','मेरा', पास
    तब तक रघुवर रहेंगे भीतर दिखेंगे नाहीं!

    विषयासक्ति में लिप्त होकर
    मनाश्व को अनियंत्रित छोड़कर
    इधरउधर भ्रमण करोगे, मार्ग मिलेंगे नाहीं!

    हाँ भ्रम जगत् है, जगत् है भ्रम
    इसमें लिप्त किया जो जीवन
    जनम-मरण करते रहोगे,भ्रम मिटेंगे नाहीं!

    अतः हे जगत् के जीव, रघुवर में लगा मन
    रह इस जगत् में, पर कर सब उनको अर्पण
    तब इस जगत् के प्रपंच रहेंगे, पर तुझसे लिपटेंगे नाहीं!!


    ✍-राजकुमारी

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    हे रघुवर!!

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