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    कभी लिखता हूं।
    कभी मिटाता हूं।
    अपने सांये को गले से लगाता हूं।
    तेरी यादों को ओढ़ कर सो जाता हूं।
    रात की तनहाई में चांद को देखकर मौहब्बत के अल्फाज़ दोहराता हूं।
    खुद को बहुत सताता हुं।
    खुदा से तेरी खैरियत के खातिर मन्नतें मांगता हूं।
    अब गलतीयो की वजह पर अफशोश जताता हूं।
    आज भी तेरी मौहब्बत में खुद को फतेह करता हुआ पाता हूं।
    आज भी महफ़िल में तुझे अपना बताता हु।
    - सचिन सौरभ
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