• nehulatagarg 15w

    संसार में किसी भी धर्म की आवश्यकता नहीं होगी और संसार स्वर्ग से भी कहीं अधिक सुन्दर होगा और मानवता का ही साम्राज्य होगा । हमारे युवराज चित्रांगद पराक्रमवर्धन के ही वचन है यह और वो हमेशा कहते है की , संसार में जो भी है वो धर्म हो संस्कृति - सभ्यता हो राष्ट्र हो साम्राज्य हो या फिर मानव का अस्तित्व वो ना ही तलवार के दम पर बना है ना उससे मिटा है और ना रहा है । व्यक्ति किसी भी विचारधारा का हो व्यक्तित्व और चरित्र वाला हो किसी भी संस्कृति सभ्यता और धर्म को मानने वाला सम्राट हो या आम नागरिक या सही मार्ग पर चलने वाला हो या दुष्मार्ग पर दुष्कामी हो सबको अच्छाई का ही सहारा लेना पडता है और किसी भी व्यक्ति का परिचय हो या संसार में उसका स्थान वो उसके गुणों और चरित्र से ही मिलता है और जिसने अपने चरित्र को उत्कृष्टता के शिखर पर पहुंचा लिया है वो ही मानव कहलाने का अधिकारी है और सम्राट बनने का भी औऱ जीवन के हर पडाव पर ही नहीं बल्कि संसार के हर क्षेत्र में विजय भी वही पा सकता है और महानता को अलंकृत भी वही कर सकता है और जिसने अपने चरित्र को जीत लिया उसने संसार को जीत लिया । हमारे युवराज के इसी मंन्तव्य के साथ यहाँ पर शिक्षा दी जाती है और संसार का ऐसा कोई भी राष्ट्र नहीं है जहाँ से यहाँ अध्ययन - अध्यापन और विचार - विमर्श के लिये विद्वान यहाँ आते है और यहाँ बच्चों के तीन वर्ष की आयु से ही अध्ययन प्रारम्भ करवाया जाता है और आपको यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा की , यहाँ निम्नत्तम से निम्नत्तम समझी जाने वाले वर्गों से ही नहीं अपितु गणिकाओं और उनके बच्चों को भी अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होता है और यहाँ पर गरीब मेधावी विधार्थीयों को ही नहीं बल्कि दुर्बल बुद्धिमता वाले बच्चों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है और हमारे युवराज सदैव सबकी समस्याओं के निराकरण और प्रोत्साहन के लिये तत्पर रहते है । इब्राहम अबु और रूखसार खेमें में बैठे रहते है और इसी बात पर चर्चा कर रहें होते है की , आहन्ना और चित्रांगद की सोच कितनी मिलती है और उनके

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    चित्रांगना

    इरादे हौसलें और दुनिया और इस समाज को बदलने की हिम्मत और ताकत रखते है । रूखसार कहने लगती है - कोई यकीन कर सकता है की , दुनिया का ऐसा कोई मुल्क नहीं और ऐसी कोई सल्तनत नहीं जहाँ रक्काशाओं और मयखानों और जुआघरों का साया ना हो लेकिन यहाँ तो यह सब नदारद कर दिया गया है और वो भी शहजादें ने खुद अपने बलबूते पर । आहन्ना दीवान - ए - आम में बैठी रहती है और तभी औनियोन अन्दर दाखिल होते है और उन्हें देखकर सौफें से उठकर पूछने लगती है - हमने आपसे जो कहा था वो काम हुआ तो औनियोन नजरें नीचे किये शर्मिन्दगी के साथ कहने लगते है - वो शहजादें ने साफ इनकार कर दिया है और उनका कहना है की , वो आपको इन सब मसलों में नहीं पडने देना चाहते और इसीलिये उन्होंने सबको बुलावा भेजने से सख्त इतराज किया है और .. । आहन्ना औनियोन को रोक देती है और नाराजगी से कहने लगती है - आपको और आगे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है । अब हम इजाजत चाहेंगे वैसे हमने पूरी कोशिश की थी आपके शहजादें को लेकर दिखे गये तमाम ख्वाबों की ताबीरों को अमलीजामा पहनाने की और उन्हें एक अजीम - ओ - शान शंहशाह बनाने की और रोम के शाह के रूप में तख्त - ओ - ताज तक ले जाने की लेकिन अफसोस कोई अगर चलना ना चाहें तो उसे जबरदस्ती चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिये क्योंकि इससे ना सिर्फ़ आपका वक्त और आपकी कोशिश भी बेकार चली जाती है और जो आप उस वक्त में कर सकते थे उससे भी चुक जाते है । एक और बात कहना चाहेंगे शायद आपको बुरी लगे मगर सच्चाई है की , ख्वाब वही देखों जिसके लायक वो इंसान हो और जो ख्वाब को पूरा करने की कुव्वत रखता हो और ऐसे के लिये ख्वाब देखा जायें जो अपने अन्दर वो काबिलियत ही ना रखें उसके लिये अरमान सजाना सिर्फ़ उन्हें मौत की नींद सुलाना होता है और आपने भी वही किया । एक ऐसे इंसान को लेकर वो तमन्ना कर बैठे जो उसके लिये बना ही नहीं तो हमारी तो आपको यही सलाह है और एक सच्चाई भी है यह की , इंसान की सोच उसके ख्यालातों का नेकनियत होना मायने नहीं रखता बल्कि मायने रखता है