• a_librettist 23w

    माँ

    क्यों तुम उस पहेली की तरह हो जिसे मैं कभी बुझा ही नहीं पाया,
    क्यों तुम अंधेरे में उस रोशनी की तरह हो, जिसकी शुरुआत मैं कभी खोज ही नहीं पाया,
    लोग तो मंदिरों में ढूंढते है अपना भगवान, मेरा तो पूरा संसार सिर्फ तुझी में समाया,
    कैसे मेरे हर डर को मिटा देती हो अपनी हल्की सी मुस्कान से,
    इतना बड़ा दिल माँ, तुम लाती हो कहाँ से?
    कैसे अपना निवाला अपने बच्चों के नाम कर देती हो,
    कैसे सिर्फ सुनकर मेरी आवाज़, दर्द मेरा पहचान लेती हो
    तुम वही परी तो हो, जिसकी कहानियाँ तुम मुझे सुनाती थीं
    जो खुशी से जहर का घूंट पीकर, पूरी दुनिया पर अमृत बरसाती थीं
    यह कविता, यह शब्द सब कम है तुम्हें दर्शाने में
    तुम्से ज्यादा बलिदान ना किसी ने दिया है इस ज़माने में
    माँ, कब तक हमेशा सब को अपने आगे रखोगी
    माँ, कब तक मेरे भगवान की जगह यूँ ही लेते रहोगी
    ©a_librettist