• singh_harshwardhan 14w

    भाग-3 (d)

    आबू में जितने घर नही थे उस से दुगने होटल और रेस्टॉरेंट दिखाई दे रहे थे। हम कुछ देर सीधे चले फिर कुछ एक दो बार दाएं मुड़े और कुछ एक दो बार बाएं। और अंत में एक गली के आगे रुक गए।
    मैंने माँ से पूछा, "पहुंच गए हम?"
    माँ गली की और इशारा करके बोली,' वो जो आखिरी में घर दिखाई दे रहा है, वही रहेंगे हम।"
    मैं कार से बाहर निकला और मकान की 7और चल दिया। गेट के आगे पहुंचा ही था के किसी ने चेतावनी भरे अंदाज़ में आवाज़ दी,
    "अरे रुको कहाँ घुसे जा रहे हो अंदर, कौन हो तुम?"
    मैं वही सहम सा खड़ा हो गया। पिछले एक घंटे से जो अपनापन इस शहर के लिए आ रहा था, वो उस आवाज़ के आखिरी के तीन शब्दों से खत्म हो गया।
    मैं पीछे मुड़ा और इस से पहले के मैं कुछ बोल पाता वो आवाज़ फिर से कानों में पड़ी।
    " अरे कमाल का लड़का है, कुछ बोलते क्यों नहीं हो? कोन हो तुम, ये मेहरा अंकल का घर है, और उन्होंने मुझे साफ साफ कहा है कि कोई भी अनजान अगर अंदर घुसे तो पापा को आवाज़ दे दूँ। अरे हाँ, पापा को आवाज़ लगानी है........"
    और वो ज़ोर से चिल्लाई, "पा........पा, कोई मेहरा अंकल के घर का बाहर वाला गेट खोल रहा है।"
    मुझे मानो सांप सूंघ गया था, बिन आत्मा का शरीर बना खड़ा था मैं वहाँ। इतने में माँ का हाथ मेरे कंधे पे पड़ा और हमेशा की तरह फिर से वो मुझे होश में लाई।
    "माँ वो......वो मैंने गेट खोला तो कौन हूँ मैं, मेहरा अंकल का घर और पापा को आवाज़ लगा दी"
    माँ बोली, "क्या??
    मैंने फिर से पूरे होश में आके समझाने की कोशिश की, इतने में जिन्हें आवाज़ दी गई थी, वो नीचे आ गए और जिसने आवाज़ दी थी वो उनके पीछे पीछे।