• madhavpaterya 12w

    आखिर क्यों मचल रहे हो तूफान को भाँपो ज़रा शांत रहो
    पत्तों के घराने से हो ज़रा औकात में रहो

    समझे नहीं अभी तक,अंदर तक पत्थर हूँ
    अरे कांच के घर वालो ज़रा औकात में रहो

    कोई खिलाड़ी नहीं,सारा खेल ही मैं हूँ
    शतरंज के प्यादो ज़रा औकात में रहो

    जहाँ बेहद भी शरमा जाये उस हद तक इश्क़ किया मैने
    मुझे इश्क़ सिखाने वालो ज़रा औकात में रहो

    उसपे कोई आंच आये तो सूरज तक निचोड़ के रख दूँ
    उसे गर्मी दिखाने वालो ज़रा औकात में रहो

    उसकी आँखों के नशे में रहता हूँ चूर दिन रात
    दो तीन जाम में बहकने वालो ज़रा औकात में रहो

    बेख़ौफ़ तो इतना हूँ कि जान हथेली पे खेलती है
    खून की दो चार बूँदों से डरने वालो ज़रा औकात में रहो

    उसकी अंगड़ाइयो तक को कागज़ पर नज़्मों से कैद कर दिया
    दो चार फ़सानो के शायरों ज़रा औकात में रहो
    माधव
    ©madhavpaterya