• arunbhardwaj 5w

    सचिव वैद्य गुरू तीन जौं प्रिय बोलहिं भय आस
    राज धरम तन तीन कर होई बेगहीं नाश

    ( श्री गोस्वामी तुलसीदास विरचित रा. च. मा. )

    अवध क्षेत्र का हूँ , अवधी भाषा के कुलभूषण पंडित कवि गोस्वामी तुलसी दास की माणिक्य पंक्तियों को स्तम्भ बनाकर , विचारों का आवाहन करता हूँ । आप विद्वत्समाज एकान्य होकर अक्षर/शब्द / वाक्य के भाव को आत्मसात करें ।

    विचार / परिमाण / परिणाम ---- क्रमश:


    १) हिरणाक्ष्य एवं हिरणकश्यप : प्रभावशाली राजा , भूपति के साथ -साथ त्रिलोक आधिपत्य की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक/ किंतु राक्षस / वध हुआ ।

    २) महा पण्डित महाराज रावण : प्रभावशाली राजा , भूपति के साथ -साथ त्रिलोक आधिपत्य की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक, श्रेष्ठ मित्र, नीति निपुण / किंतु राक्षस / वध हुआ ।
    ३) महाराज मामा कंस : प्रभावशाली राजा , भूपति के साथ -साथ त्रिलोक आधिपत्य की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक/ किंतु राक्षस / वध हुआ ।

    ४) महाराज घनानंद : प्राचीन भारत का प्रभावशाली राजा , भूपति के साथ -साथ त्रिलोक आधिपत्य की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक, दासी पुत्र/ किंतु राक्षस / वध हुआ


    ५) यवन, शक, हूण, पुर्तगीच,डच एवं मुग़ल : प्रभावशाली राजतंत्र , अनेक भूपति के साथ -साथ धन वैभव की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक/ किंतु विचार से राक्षस / अंत हुआ ।
    (Note: बड़ा दु:ख होता है कि इन्हीं तंत्रों में अकबर महान व कर्मावती के मुँहबोले भाई हुमायूँ भी थे , उनसे मेरी लेखनी आजीवन क्षमाप्रार्थी रहेगी )

    ६) आततायी सिकंदर : प्रभावशाली राजपुत्र, भूपति बनने की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक/ किंतु विचार से राक्षस / वध हुआ

    ७) सैनिक हिटलर : प्रभावशाली राजा , भूपति बनने की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक/ किंतु विचार से राक्षस / आत्महत्या से अंत हुआ ।

    ८) सद्दाम हुसैन : प्रभावशाली राजा , भूपति बनने की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक/ किंतु विचार से राक्षस / वध हुआ

    ९) मुअम्मर गद्दाफ़ी :प्रभावशाली राजा , भूपति बनने की महती आकांक्षा, प्रजा प्रेमी, कुशल परिवार पालक/ किंतु विचार से राक्षस / वध हुआ

    इनकी संख्या की इति करना काठिन्य निवारण जैसा । अस्तु मन का दु:शासन ही बैरी हैं, यदि मित्र होता तो , सर्वविदित यह श्लोक चरितार्थ करता ।

    पापान्निवारयति योजयते हिताय
    गुह्यं च गूहति गुणान् प्रकटीकरोति ।
    आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
    सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ॥
    भावार्थ 👇

    जो पाप से रोकता है, हित में जोडता है, गुप्त बात गुप्त रखता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्ति आने पर छोडता नहीं, समय आने पर (जो आवश्यक हो) देता है - संत पुरुष इन्हीं को सन्मित्र के लक्षण कहते हैं ।

    उर्पयुक्त उदाहरणों में कहीं न कहीं ये कमियाँ थी , तथागत कालखण्ड के चाणक्यों ने नष्ट किया । मेरा विश्वास है , प्रकृति के विधि सम्मत भी ।

    आलेख

    Arun Bhardwaj (Atirek)