• manigupta359 18w

    Guys, this is the second part of the story. As the story was getting a bit long, I decided to add 3rd part due to word limit! Next part will be posted in a bit of moment!!

    Thanks a lot people, for supporting me��❤❤��
    Hope you'll like this part too!!

    For the fresh readers: kindly, read the first part, if you're reading this for the first time, under #stories_by_mani ��

    @whiskeyblues @_shweta @hardeepheals @dsd07sr @harsha154

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    वह सावन की सांझ... (2/3)

    सूरज की सुनहरी किरनें भी ज़रा मद्धम-मद्धम अंगड़ाई लेते हुए, धरती पर आ रही थी मानो ये छोटू को कुछ और देर सपने बुनने की इजाज़त दे रही हो।

    वही, पास में चायवाले की दुकान से नाश्ते की मनमोहक खुशबू आ रही थी, राशन की दुकानों के शटर खुल रहे थे, बच्चे स्कूल और बड़े अपने काम पर जा रहे थे। तभी मेरा ध्यान छोटू की ओर गया जो कि नींद से जागकर बैठा हुआ था।

    कुछ देर बाद, दातुन करके, वह अपना सामान खोलकर बैठ गया। इंतज़ार के कुछ पलों के बाद, एक शख्स, जूते पाॅलिश कराने आया, छोटू का पहला ग्राहक। काफ़ी जल्दी में लग रहा था वह, मानो दफ़्तर के लिए देरी हो रही हो। छोटू खुश होते हुए बोला, "सलाम साब"। तब पहली बार उसकी दबी हुई सी आवाज़ सुनी, जो कि किशोर अवस्था के रंग में रमी नहीं थी।

    "ज़रा जल्दी कर!" वह आदमी बोला। छोटू ने जलदी ब्रश रगड़ना शुरु किया, पर कुछ क्षणों बाद, उसकी रफ़्तार धीमी होती गई, मानो उसका ध्यान कहीं ओर आकर्षित हुआ हो। गोर से देखने पर पता लगा कि वह, अपनी बांई तरफ़, सामने खड़े एक आदमी को अख़बार पढ़ते देख रहा था। वह जूते पाॅलिश कर चुका था, लेकिन उसका ध्यान वही रहा।

    "कितने पैसे हुए?" तभी ग्राहक का सवाल उसे हकीकत में वापस ले आया। "4 रुपए, साब" वह बोला। कुछ और देर तक, वह उस आदमी को निहारता रहा, न जाने क्या सोच रहा था छोटू, मैं उस समय समझ न पाया।

    और ऐसे ही, छोटू को काम करते 20 दिन बीत गए। उसने, इस दौरान तकरीबन 40-50 रुपए कमा लिए थे। एक शाम, उसने अपने झोले से एक छोटा पर्स निकाला और जुड़े हुए पैसे देखने लगा। अनपढ़ता के कारण, वह उन्हें जोड़ तो न पाया पर उसके चेहरे की मुस्कान, कुछ अच्छी ख़बर बता रही थी।

    "छोटू, ये जूते जोड़ दे!" पास ही का एक ग्राहक आया। छोटू को काम करते-करते, अब डेढ़ महीना हो चुका था। लोग उससे बूट पाॅलिश और जूते-चप्पल ठीक कराने आने लगे थे। अब वह, 'छोटू' के नाम से जाना जाता था। देखने वाले को उसकी मैली कमीज़ पर लगी कालक, शायद दाग लगें और छिले हुए हाथ, शायद ज़ख्म लगें, पर मेरे लिए, वे मेहनत और लगन की कीमती निशानी थी।

    To be continued....

    _Mani Gupta_