• niharikayadav 6w

    ✒क्यों✒
    आज एक आसिफा, कल की निर्भया बनने को मजबूर है?
    - निहारिका यादव

    @nyinkeddiaries @hindiwriters @writersnetwork @readwriteunite
    #nyinkeddiaries #niharikayadav #writersofmirakee #poetsofmirakee #hindiwriters #hindi #hindipoem #justiceforasifa #asifa #raiseyourvoice #girlempowerment

    Read More

    ✒क्यों✒

    "लड़की थी वो"
    क्या यही उसकी गलती थी?
    क्या महज उसके अस्तित्व से,
    ये दुनिया जलती थी?
    क्या कसूर था उन नन्हे कदमों का?
    जिन्होंने अभी तो चलना सीखा था,
    क्या कसूर था उन आँखों का?
    जिन्होंने अभी कुछ सपने संजोए थे,
    क्या कसूर था उसके लिबास का?
    क्या कसूर था उसकी पहचान का?
    कसूर था।
    कसूर था की उसके कदमों की आहट,
    घर की चौखट तक न सिमटी थी,
    कसूर था की उसकी आँखों की मासूमियत पर भी,
    दरिंदों की रूह न पिघली थी,
    कसूर था की जो जिस्म उसने पाया था,
    इस समाज ने केवल एक खिलौना समझ उसे अपनाया था,
    कसूर उसका था,
    उसका है,
    उसका ही रहेगा।
    क्यूंकि वो कल की "नारी" है,
    उसके वजूद से ही जुड़ा एक शब्द "बेचारी" है।
    फिर चाहे वो आठ साल की बच्ची हो,
    या कोई आम लड़की,
    जब गुनाह हो रहा था,
    तब क्यों नही ये इन्साफ की ज्वाला भड़की?
    क्यों?
    क्यों नहीं तब हाथों में लिए "कैंडल",
    उसकी आबरू बचाने आये थे?
    क्यों नहीं तब सरकार की,
    सोई हुई चेतना को जगाने आये थे?
    क्यों अब अपनी मदद की गुहारो से,
    उसकी चीखों को जगा रहे हो?
    क्यों अब हाथों पर काली पट्टी बांधे,
    "वी वांट जस्टिस" का नारा लगा रहे हो?
    क्यों?
    आखिर क्यों?
    अब मज़हब की लकीरों के तले,
    उसकी पहचान छुपा रहे हो?
    क्यों?
    क्यों हर दिन , हर पल , हर क्षण,
    उसको कमज़ोर बता रहे हो?
    नहीं!
    कमज़ोर नहीं है वो,
    बस एक "लड़की" है,
    इतनी सी उसकी गलती है,
    मासूम थी वो,
    नादान थी,
    वर्त्तमान की काली सच्चाई से अनजान थी,
    एक आज़ाद पंछी उड़ने को तैयार था,
    लेकिन इस दुनिया को शायद उसकी उड़ान का आभास था,
    कहा समाज को उसका ऊंचाइयों को छूना गवारा था,
    पिंजरे में बंद होने से पहले,
    शायद एक आखिरी बार उसने माँ को पुकारा था,
    क्यों?
    क्यों नहीं उसकी पुकार माँ को सुनाई पड़ी?
    क्यों मंदिर में वो माँ पत्थर की मूरत बनी खड़ी रही?
    क्यों ये समाज एक बार फिर आक्रोश में बह रहा है?
    क्यों ये ढोंग का चोला पहन के उसका साथ दे रहा है?
    हैवानियत के परदे से ढक दिया उसका वजूद है,
    क्यों?
    आज एक आसिफा, कल की निर्भया बनने को मजबूर है?

    - निहारिका यादव