• aayushikumari 6w

    एक दिन मैं एक पक्षी पकड़ लाया।
    उसी दिन मैंने उसके लिए एक सोने का पिंजरा बनवाया।

    पहले - पहले रातों को सो नहीं पाता था वो।
    आसमान की ओर देख के तड़प सा जाता था वो।

    कुछ कहता था वो मुझसे, पर उसकी भाषा मुझे समझ नहीं आती थी।
    उसकी हर आवाज़ मेरे लिए अनसुनी ही हो जाती थी।

    उस बड़े नीले आकाश में अपने साथियो को देख के जब वो रो देता था।
    तो उसे यु रोता देख मैं अपना आपा खो देता था।

    उन आवारा पंछियो से ज़्यादा किस्मत वाला है वो, मैंने उसे खूब समझाया।
    पर मेरे नादान साथी को कुछ समझ न आया।

    एक दिन यूँही फड़फड़ा के दम तोड़ दिया उसने।
    अब क्या करू मैं उस सुनहरे पिंजरे का जब कोई रह न सका उसमे।



    साल गुज़रे, उम्र बढ़ी और चाहतें भी।
    हवाईजहाज़ से दुनिया देखना मेरी ख्वाहिश थी।

    घर पे मेरे मैंने जब ये बताया।
    न जाने क्यों मेरे सपने ने सबको चौकाया।

    मै जो कहता था उनसे, उन्हें जाने क्यों समझ नहीं आती थी।
    न जाने क्यों मेरी हर बात अनसुनी हो जाती थी।

    रातों को रोने लगा था मै जहाज़ों को उड़ता देख।
    और मेरे घर वाले भड़क जाते थे मुझे रोता देख।

    एक दिन माँ ने समझाया मुझे।
    इन आलिशान महलों और कारोबारों से खूब ललचाया मुझे।

    उस दिन मुझे मेरा वो पुराना साथी याद आ गया।
    जिसे कैद कर लाया था मैं, वो मुझे ज़िन्दगी भर कैद होने की बददुआ दे गया।

    - आयुषी

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    सोने का पिंजरा