• perceptive_writer 16w

    सोचती हू रहने दू
    जो राज़ है मेरे और मेरी डायरी के दरमियाँ
    उन्हें ज़माने के सामने क्यों जाया करू
    अपना इश्क अपने आप में ही खूबसूरत है
    कुछ किस्से न ही बयां हो तो खूबसूरत रहते है
    उन्हें वही चंद कागज़ के पन्नो के बीच रहने दू
    बेवज़ह क्यों जाया करू अपने अल्फ़ाज़ किसी पर
    उन हसीन अल्फाज़ो को वही रहने दू
    वो जो कविताए और नज़्में सिर्फ उनपे लिखा करते हैं
    कह देंगे की बस यूँही लिखा है
    उन्हें बस यूँही रहने देते है
    वो डायरी में कैद ही सही हैँ
    एक रोज़ वो नज़्में ज़माने के सामने आएगी ही
    फिर कह देंगे की सब यूँही लिखा है
    कोई शक्श नही जिसपे लिखा है
    सब बस यूँ ही लिखा हैँ ।