• pravesh1998 5w

    शारदा

    बाबूलाल -(धीमी आवाज मे) जाना तो है आज तबीयत कुछ ठीक नही लग रही। शारदा -कयो क्या हुआ? बाबूलाल -शरीर में भारीपन लग रहा है। शारदा -कल गर्मी बहुत ज्यादा थी, जेठ की तपती धूप, मैं कह -कह कर थक गयी दोपहर मे रेहड़ी छाव में खडी कर लिया करो लेकिन आप मेरी सुनते ही कहाँ हैं ।बाबूलाल -अरी पगली मजदूर को धूप से डर नहीं लगता। शारदा -बस फिर वही बात, क्या मजदूर इंसान नही होता?बाबूलाल -होता तो है अगर मजदूर धूप से डरेगा तो घर कैसे चलेगा? शारदा -मैं काम करने को मना थोड़े ही कर रही हू, बस थोडी धूप हल्की हो जाए तब फेरी लगा लिया करो। बाबूलाल -गर्मी का मौसम है, जितना फल बिक जाये ठीक ही तो है, गर्मी मे फल जल्दी खराब होता है, चल छोड बातों को, मेरे लिए एक घूँट चाय ले आ, चाय पीकर सुस्ती उतर जायेगी, फिर मैं मंडी जाऊ। शारदा -अभी लाती हू, बच्चो को भी उठाना है। इतने ही बाबूलाल की मां विजयालक्षमी (तेज आवाज मे) शारदा -शारदा ओ शारदा। शारदा - (हडबडाहट मे) जी.. जी... माजी ............................




    शेष अगले भाग में
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