• __adyah__ 22w

    |वह अंधेरा|

    " उजाले में क्या ढूंढते हो,
    खो चुका हूं मैं अंधेरे में।
    उजला सा वह बल्ब भी,
    अब चुभने लगा है आंखों को,
    दिल को, मन को, अंधेरा
    अब सिमटने लगा है अपने घेरे में,
    डर सा गया हूं इस अंधेरे में।

    सताता है डर आज भी वही,
    कि नहीं पहचान पाएगी ये दुनिया
    मेरे लफ़्ज़ों को, मेरे सपनों को,
    उड़ने की कोशिश पर भी
    खुलते नहीं हैं पर अब
    पिंजरा भी यह, इजाज़त देना
    भूल गया है, शायद?
    लगता है अब, बस पड़ा रहूंगा इसी डेरे में,
    थक चुका हूं इस अंधेरे में।

    पढ़ गए हैं शिथिल, पांव मेरे
    अभी भी, इसी देहरी में,
    निकलना चाहता हूं जहां से मैं,
    उस सुनहरी बस्ती में।
    बुझा दो रौशनी अब,
    बसता हूं यहीं मैं, इसी अंधेरे में।। "

    ©[अद्याह]™
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    That darkness....
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    | कविता - अंधेरा |

    " उजाले में क्या ढूंढते हो,
    खो चुका हूं मैं इस अंधेरे में। "

    ©[अद्याह]™

    (Read In Caption)