• poonampal_saheeb_ 3w

    सुनिए !

    सुनिए ! मेरा आप पर हक़ कहाँ
    ये तो पहले ही किसी और का है
    मेरी आपकी जिन्द़गी में एहमियत ही कहाँ
    ये तो पहले ही किसी और का है

    आज दीवारें काट रही
    सूनापन ताक रहा है
    जज्बातों का सैलाब़ है उमड़ता
    और अंधियारा दिल में है घर करता

    एक एक सांस है होती भारी
    ये इश्क़ है ही ऐसी बीमारी
    न दिल है संभलता,न जुबां है कुछ कहती
    बस इक खुमारी सी छायी रहती

    कुबूल कहाँ होगी मेरी ये मुहब्बत़ जमाने को
    बहुत फासलें है दरम्यां जताने को
    निगाहें आपकी असर पर है
    तभी तो झुकती मेरी ये नजऱ है

    होठ़ हैं थरथराते,हाथ हैं जो ठहर से जाते
    जैसे मानो आपने छुआ है
    काश़ ! ये सच हो पाता
    इन दूरियों का हिसाब़ हमें यूं न तड़पाता
    खोकर आपकी बाहों में, मैं कुछ पल को संवर जाती
    ये जिन्द़गी की राहें कुछ देर को विराम कर जाती

    मगर अफ़सोस ये हो न सकेगा
    ये मिलना हमारा अधूरा ही रहेगा
    बातें जनम़ दर जनम़ की कहाँ
    इस जनम़ का उस जनम़ से कहाँ

    सुनिए! मेरा आप पर हक़ कहाँ



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