• tera_mera_ek_safar 5w

    गुनाह क्या था मेरा…
    एक बाप होना…
    या एक इंसान होना!
    -------------------------------------------------------------------
    सोचा नहीं था कभी ऐसा भी दिन आयेगा,
    जो लफ़्ज बयान न हुए… वो अल्फ़ाजो में कहना पड़ेगा,
    बड़ी मुश्कील से संभला है उसको…
    मेरे जिग़र की तुकड़े की तरह…
    आज बिख़रता देख रो पड़ता हूँ!
    अपने ही साये को छुपते जब देखता हूँ,
    उसका दर्द अब बयान नही होता है,
    सच में ये कैसा दिन आया है!

    कभी करती थी शिकायत मुझसे,
    कभी कुछ मांग भी लेती थी,
    अब बेटी बड़ी हुई जो सहम जाती है…
    अक्सर मुझसे दूर रहती है…
    क्या खौफ़ उसने पाल रखा है…
    सच में ये कैसा दिन आया है!

    मैं रोता हूँ अकेले में,
    अक्सर उसकी बातों को याद करके…
    मेरी परी है वो फिर भी…
    खफ़ा रहती है मुझसे…
    मैं समज नही पाता हूँ उसको…
    सच में कैसा दिन आया है!

    उसकी सादगी के लिए तरसता हूँ,
    बाप हूँ फिर भी घबराता हूँ,
    किस नजरसे वो देखती है…
    समाज को जब बदलते देखता हूँ!
    सच में कैसा दिन ये आया है!

    उसके बचपन से लेकर आज तक…
    सारी बातों पे गौर करता हूँ,
    देख के समाज के बदलावं को मैं,
    खुद को ही दोषी मानता हूँ!

    संस्कार के बीज मैंने भी बोये थे,
    पर कब वो अपने रंग में आये पता न चला…
    सच है कैसा दिन आज आया है…
    बाप होकर भी मैं सहम न पाया हूँ!




    ©tera_mera_ek_safar