• sudhanshutripathi 6w

    काश

    हँसने रोने के चिह्न छोड़ जज़्बात हम अपने कह पाते ,
    ख़त मेरा पहुचाने को काश कबूतर फ़िर आते ।
    फ़िर सावन आता बारिश होती, माँ आंचल में दबका के सोती
    सड़क किनारे गड्डों में कागज की 'नाव' चला पाते ,
    ख़त मेरा पहुचाने .....….............
    सोच सोच के शब्दों को मै लिखता फिर मिटा देता ,
    मित्रों के आ जाने पर ख़त धीरे से कही छुपा देता ।
    उस रोते हसते शब्दों को माँ बाबूू जी पढ़ पाते,
    ख़त मेरा पहुचाने .... ...................
    कल बात हुई थी घर से ,पर बात रास नहीं आई ,
    माँ बाबू जी के रोने की आवाज़ पास नहीं आई ।
    ख़त मुझको फिर बिन बोले वह आवाज़ सुना पाते ,
    काश कबूतर फ़िर आते .......................
    ©sudhanshutripathi