• iamnitishthakur 7w

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    चिंताएँ

    (Part 4)
    औऱ,एक दिन सुना हो जाएगा ये उपवन ।
    ये बाग बगीचे । उजड़ जाएगा सुहाग इसका उस ख़ास दिन को । औऱ बेवा हो जाएगा यह छोटा सा जहाँ हमारा ।
    कोहराम मच जाएगा उस दिन । औऱ, शायद लाशें बिछ जाएंगी । वंश ही हमारा विलुप्त हो जाएगा शायद । जैसे किसी खास प्रजाति के जानवर किसी रोग से ग्रस्त होने पर,या हिंसा का शिकार होने से धीरे-धीरे दुनिया से विलुप्त हो जाते हैं । वह दिन हमारे इतिहास में काला दिन होगा । जिसके साथ ही हमारे इतिहास को बंद कर दिया जाएगा । अंतिम पन्नो पर उसके, कुरूप-भद्दे दाग़-धब्बे रह जाएंगे । औऱ,अन्य बहोत कुछ के साथ-साथ उम्मीदें,खुशियाँ, ख्वाहिशें,विश्वास,आस्था सब टूट जाएगा उस दिन ।

    औऱ, चन्द घँटों के अंदर ही वो हमारे धर्म के मुताबिक जलाकर ख़ाक कर दिए जाएँगे । (फिर कोई पहचानेगा भी नहीं उनको । उनकी वजुद ही नहीं रह जायेगी ।
    अस्थियों के रूप में बचे हमारे नाम और उपाधियों को जल्द ही पवित्र गंगा में बहा दिया जाएगा । हमेशा अशांत रहने वाली उन उम्मीदों औऱ ख़्वाहिशों के मिट जाने की,ख़त्म हो जाने की दुआएं की जाएंगी । औऱ, इसे रूपांतरित रूप से नामकरण किया जाएगा । इसे शांति की कामना कही जाएगी ।)
    ©iamnitishthakur