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    ज़िद न करो

    यूँ जहन्नुम तलक-ज़ीस्त उलझी पड़ी है,
    अब हसीं पल के इंतजाम की ज़िद न करो ।

    जानता हूँ, तुझ बिन मसर्रत नहीं हैं घड़ियाँ ,
    पर फिर से वो शाम लाने की ज़िद न करो ।।

    न करो इबादतों का दौर फिर से शुरू,
    फिर से अपना सबकुछ हार जाने की ज़िद न करो।

    इसी सिलसिले में हुए हैं बर्बाद इस क़दर,
    बेहिसाब गहरा दरिया पार करने की ज़िद न करो ।।

    मुहब्बत भी शब्-ए-तीरगी है सनम,
    इस तमी में ज़िया लाने की ज़िद न करो ।

    इश्क़ तो अब भी बेहिसाब है तुमसे,
    पर फिर से मीठे ज़रर की ज़िद न करो।।

    ये ज़माना बड़ा जाबित है निर्ज़-जमीं की तरह,
    अब बे-तासीर मुहब्बत-ए-बरसात की ज़िद न करो ।

    यूँ बिखरकर खुद को समेटना, मोजज़ा तो नही ,
    चलो तो, सब्रोकरार की ज़िद न करो ।।

    तेरे तबस्सुम से गुलशन हुआ करता था घराना,
    फ़क़त दर्द में मुस्काने की ज़िद न करो ।

    जला दिए हैं हमने ख़त जो तेरे इस्बात थे,
    उस ख़ाक को भी समेटने की ज़िद न करो ।।

    मानो सनम,
    उस उलझी शाम को पाने की जिद न करो,
    जो न है आश्ना, उसे फिर से लाने की ज़िद न करो ।

    इश्क़ के समंदर में यूँ तूफ़ाँ बहुत आते हैं,
    उसके साहिल पे मकां बनाने की ज़िद न करो ।।
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    जीस्त-जिंदगी । मसर्रत-खुश ।
    शब्-ए-तीरगी-अँधेरी रात ।
    ज़िया-उजाला ।
    ज़रर-घाव । जाबित -कठोर ।
    निर्ज़-बंजर । बे-तासीर-व्यर्थ ।
    मोजज़ा-जादू । तबस्सुम-मुस्काना ।
    इस्बात-प्रमाण,तथ्य । आश्ना-अपना ।

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