• dr_pradeep_sehgal 13w

    दिए जलते हैं

    दिए जलते हैं...
    उन हवाओं के लिए...
    जो लायीं हैं मुझ तक, तुम्हारी महक...
    उन निशानों के लिए--
    पदचिन्ह मेरे - तुम्हारे ,हमारी कसक ...
    उन किवाड़ों के लिए...
    जिनकी दहलीज़ से...
    निहारा था तुमने मुझे एकटक ...
    और स्वीकारा था मुझे...
    तमाम जिन्दगी के लिए ,पलक झपक ...
    याद है तुम्हें...
    तुम वीणा सी होकर झंकृत ...
    कदापि पुष्प सी होकर कुसुमित ...
    आयी थी मेरे जीवन में...
    और हृदय में अपने, मुझे...
    उतारा था तुमने...
    वो झील ...
    मुझे तो लगती ,
    अब वो प्यारी...
    बिलकुल तुम्हारे नयनो सी...
    मासूम तुम्हारे नयनों सी...
    शांत तुम्हारे नयनों सी..
    मुझे तो लगती ,
    अब वो प्यारी ...
    बिल्कुल तुम्हारे नयनों सी...
    सप्तरंग की किरणों को,
    खुद में समेटे ...
    उस स्वर्णिम वर्ण की आभा को...
    खुद में समेटे...
    किस लोक की परी हो तुम ...
    मुझको बताओ...
    मेरे लोक की सुरभि को खुद में समेटे,
    उसी वर्ण की बिजली को...
    स्नेहहिल ह्रदय से...
    मेरे हृदय की धड़कन के...
    दिए जलते हैं...
    ©dr_pradeep_sehgal