• aashish_nema 16w

    एक असहाय अन्नदाता की व्यथा को दर्शाती मेरी एक रचना .....

    ..
    ..
    .
    #hindi
    #likho_india



    एक बात सुनी है बचपन से ,
    कि देश ये कृषि प्रधान है ।
    फिर मौत को गले लगाता क्यों
    दिखता आज किसान है ।।

    खून पसीना बहा बहाके,
    जिस हल से खेत को जोता है।
    बांध के फंदा उसी हल पर ,
    किस्मत पे अपनी रोता है ।।

    सोचे कितनी मेहनत की मैंने,
    चाहे देह बीमार पड़ी ।
    केवल हाथ लगी निराशा,
    जब मौसम की मार पड़ी ।।

    कभी ओलों से मिटी फसल,
    तो कभी बंजर निकली धरती ।
    ऑखो से बहती जलधारा ,
    पर नभ से बूंद नहीं गिरती ।।

    ज्यों-त्यों फसलों का मूल्य उचित ,
    मण्डी मे अक्सर आता है ।
    पर मुझको मिलने से पहले ही,
    आधा आधा बट जाता है ।।

    औरों की मांग का शोर मचा,
    सुनता कोई मेरी चीख नहीं ।
    अपने हक का हकदार हूॅ मै,
    कोई तुमसे मांगू भीख नहीं ।।

    थोड़े पैसों मे कितनों का,
    भार सहर्ष उठाऊं मै ।
    बस कृषक नहीं मुखिया हूॅ घर का,
    क्या-क्या फर्ज निभाऊं मैं ।।

    बस बहुत देख ली दुनियादारी,
    वादों से अब मै ऊब चुका ।
    चहुँओर निराशा के नभ मे ,
    आशा का सूरज डूब चुका ।।

    रखकर अपने सीने पर पत्थर,
    आज ये कदम उठाता हू मैं ।
    खुद के खेत मे खुद के हाथों,
    खुद की बलि चढ़ाता हूॅ मैं ।।

    मरते-मरते संदेश एक ,
    देना है कुर्सीप्यारों को ।
    समझो पीड़ा हलधर की ,
    मत मरने दो अधिकारों को ।।

    गर रहे हालात यू ही गंभीर और ,
    निकला कोई समाधान नहीं ।
    तो कृषक मरेंगे यू ही सारे ,
    फिर देश ये कृषि प्रधान नहीं ।।



    आशीष हरीराम नेमा

    Read More

    {असहाय अन्नदाता }

    Plz Read caption. .
    ©aashish_nema