• kishor634 7w

    यदि आपने इस कविता के भाग-1 और भाग-2 को नहीं पढ़ा है, तो कृपया @kishor634 पर जाकर पढ़ लें। ये रहा "दोगे क्या-भाग 3"।
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    दोगे क्या.....? (3)

    पारिवारिक अंतरप्रेम की,
    अहमियत को ना समझ सकूँ,
    दूसरों की सफलता से,
    जागृत घृणा ना तज सकूँ।
    माँ-बाप को अपने छोड़कर,
    कहीं दूर बसा लूँ अपना घर,
    सोचूँ, न छोड़े वंशज मुझे,
    ऐसा चमत्कार करोगे क्या?
    इस बार यूँ ही जो रो-रोकर,
    गुज़ार लूँ जीवन अगर,
    तो अगली बार मुझे फिर से,
    ये मनुज अवतार दोगे क्या? .....अगला भाग- जल्द ही
    -किशोर शुक्ल
    ©kishor634