• rudrii 7w

    एक दिन मैं कहीं खो गया था

    ।।।।।

    जब देखा मैंने नीले आकाश पर
    छाए बिखरे कुछ विचित्र बादल
    लगा बनाने कुछ तस्वीर कुछ कहानी
    कुछ देखे मैंने चेहरे, कुछ महल और कुछ नादानी
    उन बादलों में कहीं मैं ठहर गया था
    एक दिन मैं कहीं खो गया था

    बादल का सूरज को घेरना और फिर छट जाना
    सूरज की किरणों का माथे पर पसर जाना
    एक बाग था, एक उपवन था
    एक पेड़ था एक चिड़िया थी उस पर
    वो कुछ गा गयी और मैं सुन रहा था
    एक दिन मैं कहीं खो गया था

    हरी-हरी सी दूर्वा थी एक फूल खिला था पौधे पर
    एक तितली जो चूम गयी थी सारा मधुबन
    एक शशक था जो फुदक रहा था
    बारिश में जीवन खिल रहा था
    उन बारिश की बूंदों में जब मैं नहा गया था
    एक दिन मैं कहीं खो गया था

    मधुर-मधुर सी हवा गुजरी जब
    धीरे-धीरे शाम ढली जब
    आकाश ने जब पोशाकें बदली
    सूरज ने जब लाली बिखेरी
    वो शाम को जब मैं जी गया था
    एक दिन मैं कहीं खो गया था



    Röh!7