• krishnasahay 5w

    मैं अकेला

    मैं हूँ बिल्कुल अकेला,
    अपनी इस दुनिया में,
    कभी घटता, कभी बढता
    कभी गायब होकर खो जाता,
    अपने दुख दर्द का साथी।

    प्रकृति ने मुझे भेजा अकेला,
    परँतु मैं प्रकृति से हारा नहीं,
    कर्म में व्यस्त,
    अंधकार रूपी अग्नि की मंथन कर,
    अपनी चाँदनी रूपी आँसू से
    प्रकाशमय शीतलता की सृष्टि
    करने में तत्पर हूँ,
    अकेला होकर भी मैं।

    उष्ण सागर पर आस नौका लिए,
    ज़िन्दगी की तन्हाई को सहते हुए
    इच्छाओं के भवरों पर आह भरते हुए,
    लगाए बैठा हूँ आस , एक निजप्रकृति की साथी पाने के लिए,
    मैं अकेला चाँद।।