• arohi1 14w

    “माँ शब्द नहीं जो लिख पाऊँ”

    जब चोट पहुँचती है तुझको,जो पहला शब्द निकलता है,
    ज़ख़्मों का तेरे दर्द जो है,उसकी आँखों मे दिखता है,
    कोख मे तुझको पाला है,तेरी साँसों की भागी है,
    तेरी ख़ुशियों का चहरा है, तेरी ठोकर की साथी है,
    इश्वर का वरदान है वो,चरणों मे उसके झुक जाऊँ,
    आदर मे क़लम भी रुकती है,माँ शब्द नहीं जो लिख
    पाऊँ,

    मातृ शक्ति वो संबल है, जिसपर जीवन टिकता है,
    उसके हाथों की छाया मे,सारा संसार सिमटता है,
    स्वार्थ मुक्त एक मूरत है,ममता का जिसकी पार नहीं,
    जो अंश का उसके रक्षण हो,छू पाये कोइ भी वार नहीं,
    चहरे पर तेज टपकता है,आँचल मे उसके रुक जाऊँ,
    आदर मे क़लम भी रुकती है,माँ शब्द नहीं जो लिख
    पाऊँ,

    ~आरोही