• theshekharshukla 10w

    छोड़ यादें
    तोड़ बंदिशें

    निकल फ़िर
    नई उड़ान पर

    रोक न सके
    कोई पथ पर

    ऊँचाई इतनी
    जमीं दिखती रहे

    थक जाए ग़र मन
    ओढ़ चादर ईबादत की

    फ़िर निकल
    अपनी उड़ान पर

    हवा के रुख़ से
    फर्क़ किसे है

    मंज़िल ही जब
    देती हौसले है

    उड़ता मन
    अरमान बड़बोले है

    सम्हाल इसे
    नियत से जो डोले है

    फ़िर निकल
    अपनी उड़ान पर।

    ©theshekharshukla