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    तुम

    तुम ना बिल्कुल ‛आईने’ की तरह हो
    जैसे उससे मैं खुद में कुछ छिपा नहीं सकता, तुमसे भी मैं कुछ भी नहीं छुपा पाता हूँ
    जैसे उसमें मैं खुद को हूबहू देख पाता हूँ, वैसे ही तुममें मैं खुद को देखकर अपनी असलियत जान पाता हूँ

    तुम ना बिल्कुल ‛वक़्त’ की तरह हो
    जैसे वक़्त को उसी लम्हे में जिया जा सकता है , मैं भी तुम्हें बस जी लेता हूँ
    जैसे वक़्त को चाह कर भी रोका नहीं जा सकता, तुम्हें भी मैं रोक नहीं पाता, सिर्फ गुज़रने देता हूँ

    तुम ना बिल्कुल ‛रेत’ की तरह हो
    जितना भी मुट्ठी में कसना चाहता हूँ, उतना ही फिसलते जाती हो
    जैसे रेत निकल कर हाथों में कुछ चमकते टुकड़े छोड़ जाते हैं, तुम भी मेरे पास हर बार वैसे ही कुछ चमकीली यादें छोड़ जाती हो

    तुम ना बिल्कुल ‛पानी’ की तरह हो
    जहाँ भी जाती हो, अपनी ही धुन में रहकर सब कुछ साथ लेकर चलती हो
    जैसे पानी पीकर भी उसकी तलब हमेशा रहती है, वैसे ही तुमको कितना भी क्यों ना देखूँ , तुम्हारी तलब हमेशा जी को रहती है

    तुम ना बिल्कुल ‛पिंजरे में बंद पंछी’ की तरह हो
    जैसे वो नहीं समझ पाता कि हम उससे प्यार करते हैं, तुम भी मेरे आसपास रहकर मेरा प्यार नहीं जान पाती हो
    जैसे वो उड़ने को बेताब रहता है, तुम भी मुझसे दूर जाने के लिए परेशान रहती हो

    तुम ना बिल्कुल ‛पेड़’ की तरह हो
    जैसे वो अपनी छाँव से आराम देता है, तुम भी मुझे अपनी आगोश में रखकर सुकून देती हो
    जैसे वो नासमझ बनकर सबके साथ एक जैसा व्यवहार करता है, वैसे ही तुम मेरी चाहत से अनजान होकर सबसे दोस्ती कर लेती हो

    तुम ना किसी ‛मधुर संगीत’ की तरह हो
    जहां भी रहती हो , सबको अपनी तरफ खींचकर समाँ बाँध देती हो
    सुनने वाला किसी भी उम्र का रहे, उसे तुम जवाँ कर देती हो

    पता नहीं खुदा ने तुम्हें इतना अच्छा क्यों बना दिया है
    खामी तुममें कुछ नहीं है फिर भी क्यों खामियाजा मुझे भुगतना पड़ रहा है
    अब बताओ किसे दोष दूँ , खुद को या खुदा को ?
    खैर, दोष किसी का भी रहे
    दुआ यही है कि तड़पकर भी ये दिल तुझे चाहता रहे
    मैं तुम्हारा कभी ना भी हो पाऊँ तो तू हमेशा मेरा कहलाता रहे
    ©feel_the_same