• ajayamitabh7 14w

    तुम बहुत खुबसूरत हो:कविता:अजय अमिताभ सुमन

    तुम्हे पता है अभिलाषा,
    तुम कितनी खुबसूरत हो,
    देखना हो तो ले लो मेरी आँखे,
    कि चलती फिरती अजंता की मूरत हो,
    तुम बहुत खुबसूरत हो।
    पलकों के ख्वाब हो तुम,
    फूलों के पराग हो तुम ,
    गाती जो गीत कोयल,
    वो गीत लाजवाब हो तुम ,
    चांदनी चिटकती रातों में
    और मदहोशी छा जाती है,
    ऐसी मनोहारी मुहुरत हो,
    सच में तुम बहुत खुबसूरत हो ।

    जैसे चाँद बिना चकोर कहाँ,
    बिन बादल के मोर कहाँ ,
    जैसे मीन नहीं बिन नीर के,
    और धनुष नहीं बिन तीर के,
    जैसे धड़कन का आना जाना,
    आश्रित रहता है सांसों पे,
    ऐसी मेरी जरुरत हो,
    अभिलाषा तुम बहुत खुबसूरत हो ।

    मैं गरम धुप , तू शीतल छाया ,
    मैं शुष्क बदन , तू कोमल काया,
    क्यूँ कर के ये मैं कह पाऊं,
    तू बन जाओ मेरा साया,
    मरुभुभी के प्यासे माफिक,
    मारा मारा मैं फिरता हूँ,
    जो एक झलक से बुझ जाये
    ,ऐसी मोहक तुम सूरत हो,
    सच मुछ बहुत खुबसूरत हो।

    तेरा रूप अनुपम ऐसा कि,
    शब्द छोटे पड़ जातें है,
    ऐसी देहयष्टि तेरी कि,
    अलंकार विवश हो जातें है,
    बस यह के चुप होता हूँ,
    नयनों से दिल पे राज करे,
    ऐसी शिल्पकार कि मूरत हो,
    अभिलाषा तुम बहुत खुबसूरत हो।

    अजय अमिताभ सुमन
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