• fyrkant_bul 6w

    सवाल (१)

    मन में ढ़ेरो ख्याल आते है कि कही हमारा साथ पल दो पल या साल डेढ़ साल का तो का नहीं?
    फिर आदतन तुम्हारे पुराने सारे वादे याद आ जाते हैं।
    होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आती है पर सवाल वही का वही रह जाता है, तैरता हुआ, मेरे ज़ेहन के किसी कोने में।
    बहुत बेदर्द होता है इश्क़,अब समझ आ रहा है। मारता भी नही और जीने के लिए छोड़ देता है, ऐसी सज़ा से कोई क्यों न डरे आखिर।
    बात आती है उस सवाल की।
    सवाल ऐसा सवाल नही होगा किसी औऱ के लिए ज़नाब। लेकिन सवाल तो ऐसा है मेरे पास की उस पर भी लोग उंगलियां उठा देंगे कि आखिर ऐसा सवाल तुम्हारे मन में उठा कैसे?
    अरे भाई,
    इंसान हूँ, दिल मेरा भी है।
    हंस के टाल जाऊ मज़ाक को तो मेरी लापरवाही नही है।
    बच्चपन से दर्द को हँस कर टालना सिखाया जो गया है। कद्र करो उस हँसी की यारों जो कि हज़ारों दर्द छिपाये बैठी है।

    दर्द तो तुम भी बखूभी निभा लेते हो। सवाल तो तुम्हारे मन में भी बहुत होंगे...... पर सवाल-जवाब करना तुम्हें आता नहीं।
    और रहे मेरे हर सवाल के जवाब की बात, वो तो तुम्हारी वो मोहक से मुस्कनिया है जो तुम होंठों के किनारे दबा के रखते हो। जब हल्का सा भी भाँप जाते हो कि मुझे तकलीफ़ है, तो बस मुझे खूब हँसाते हो।
    दर्द तुम्हरे अंदर भी है पर उस दर्द में सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए मुस्कुराते रहते हो।

    अक्सर मुझे जो आनंद ठंडी-ठंडी खीर और गरमा-गरम पूड़ी खाकर आता है, वैसी ही ठंड़ी-गरम वाला आनंद मुझे तुम्हारी मुस्कान देख कर मिलता है।
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