• himani_ 3w

    छोड़ दिया था ना मैंने, मैं तो आगे बढ़ गयी
    जिस्म जैसे चल रहा था और रुह वहीं रुक गयी थी
    तु घर का वो हिस्सा सा है जिसको बंद करदो तो शांत हो जाता है,पर जो हटाने की कोशिश की तो पूरा घर ढह जाता है
    तुझे ना सोचूँ तो दिल मूझसे बगावत करने लगता है
    और जो रखूँ ख्यालों में तूझे तो जमाना शिकायत करने लगता है
    जब भी सोचती हूँ अब नहीं ज़हन् में तु आयेगा ...तु रह रह के याद आता है
    वाकिफ़ कराने को मूझे इस सच से मन अक्सर उदास हो जाता है
    तुझे कहाँ खबर है,कब तु मेरी सुनता है
    तुझे चाहने को हर दिन यह दिल मूझसे लड़ता है
    कभी खुद से कभी जमाने से अक्सर तुझे छूपाती हूँ
    मैं कहाँ किसी से दिल का हाल साझ़ा कर पाती हूँ
    छोड़ कर सब , जब भी आगे बढ़ती हूँ नये मूकाम पाने को
    तभी मेरी रुह मूझे पूकारती है ....वापस वहीं लौट आने को
    जब दूर तुमसे रहने की ठानी थी
    यह दिल की मर्ज़ी नहीं मेरी मनमानी थी
    ज़िद करने की मेरी आदत पुरानी थी,
    हर बार बातें अपनी इससे मनवा भी लेती थी
    पर इस बार किस्सा तेरा था,कैसे सुनता मेरी यह मन,
    इसको तो तुझसे वफादारी निभानी थी
    अब भी मैं सोचती हूँ अक्सर
    छोड़ दिया था ना मैंने ,मैं तो आगे बढ़ गयी थी
    पर जिस्म़ जैसे चल रहा था और रूह वहीं रूक गयी थी
    ©himani_