• kmeenutosh 23w

    तो अब साहित्य को भी अपने प्रचार का माध्यम बनाओगे ?

    क्या इसीलिए लेखक बने हो ?

    प्रचार के और भी कई विकल्प उपस्थित हैं फिर साहित्य को ही मोहरा बनाना क्या आवश्यक है ?

    लिखना है तो कुछ ठोस लिखो , आपसी रंजिशों के निबाह का साहित्य कोई उपकरण तो नही , जिसमें जब चाहे जैसे चाहे द्वेष भर दिया जाये । समाज व राष्ट्रहित की भावना यदि नही है हृदय में तो किसी दंगल में जाओ वहाँ करो अपने प्रतिद्वंदी से दो दो हाथ । साहित्य को बक्श दो ।

    अश्लील कहानी व कविता से क्यूँ भाषा व साहित्य का स्तर गिराते हो ?

    क्या मिलता है ऐसा करके ? कौनसी नारी देह प्रप्त कर जाते हो ये सब लिख कर ?

    कौन स्त्री आकर्षित होती है ऐसी अभद्र रचना पढ़कर भला ?

    ना जाने ये किस दिशा में बह रहे हो ? हासिल क्या करना चाहते हो इससे ? और उद्देश्य क्या है तुम्हारा ?

    क्यूँ किसी के सुन्दर प्रयासों पर कीचड़ उछालते हो ? ईर्ष्या तुम्हें है तो अपने पास तक रखो , दूसरों को क्यूँ उकसाते हो ? ना स्वयं कोई बेहतर कार्य करने के इच्छुक हो ना किसी अन्य को करने ही देते हो ?

    किसी के भी प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं है क्या तुम्हारा ?

    ये सभी चंद ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर हम तलाश रहें हैं ... किसी के पास हों तो कृपया हमें भी बतायें ।

    ©के मीनू तोष (१४ मई २०१८)